उत्तर प्रदेश

उत्तर_प्रदेश_प्राविधिक_शिक्षा_विभाग_में_अटैचमेंट_सिंडिकेट_का #बोलबाला: ढाई लाख रुपये वेतन पाने वाले अफसर कर रहे क्लर्क का काम, बेटियों की शिक्षा बेपटरी

लखनऊ।

उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और डिजिटल इंडिया का नारा देकर छात्राओं को तकनीकी शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्राविधिक शिक्षा विभाग के भीतर प्रशासनिक ईमानदारी की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। शासन और निदेशालय के उच्च अधिकारियों की कथित मिलीभगत से विभाग में एक संगठित अटैचमेंट सिंडिकेट पनप चुका है। इसके चलते जहां एक तरफ प्रदेश की हजारों छात्राओं का भविष्य अंधकार में धकेला जा रहा है, वहीं दूसरी ओर डेढ़ से ढाई लाख रुपये प्रतिमाह वेतन पाने वाले विभागाध्यक्ष और व्याख्याता पैसों व रसूख के दम पर लखनऊ और कानपुर में अटैच होकर बाबुओं जैसा काम कर रहे हैं। विडंबना यह है कि विभाग के मंत्री स्वयं एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हैं, फिर भी उनके नाक के नीचे महिला पॉलिटेक्निक संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से अपंग बना दिया गया है।
अटैचमेंट सिंडिकेट का ढांचा और फर्जी ट्रांसफर का खेल
एक तरफ नए संस्थानों में शिक्षकों का भारी अकाल है, तो दूसरी तरफ चालू महिला पॉलिटेक्निकों जैसे लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, बलिया, अमेठी और महोबा के शिक्षकों को लाकर लखनऊ तथा कानपुर के मुख्यालयों में अटैच कर दिया गया है। ऑनलाइन ट्रांसफर प्रक्रिया को केवल एक दिखावा बनाकर रख दिया गया है। अधिकारियों की शह पर लखनऊ और कानपुर के पॉलिटेक्निकों में सारे पद भर दिए गए, जबकि प्रदेश के अन्य जिलों के संस्थान शिक्षक विहीन हो गए। धांधली का आलम यह है कि जहां संबंधित पाठ्यक्रम या ब्रांच संचालित ही नहीं होती, वहां भी अनावश्यक शिक्षकों को पदस्थ कर दिया गया है। जब सरकार एआई और डिजिटल वर्किंग को बढ़ावा दे रही है, तब ये कर्मचारी यही काम अपनी मूल संस्था में बैठकर ऑनलाइन क्यों नहीं कर सकते, जिससे सरकारी धन भी बचे और बेटियों को योग्य शिक्षक भी मिलें।

सिंडिकेट के मुख्य सूत्रधार: उपनिदेशक निदेशालय कानपुर आत्म प्रकाश सिंह, अवधेश पटेल और विकल्प कुमार सिंह इस पूरी व्यवस्था के मुख्य सूत्रधार बताए जा रहे हैं।
ढाई लाख वेतन पर क्लर्क का काम, कंप्यूटर साइंस ब्रांच ठप
अटैचमेंट का मज़ा ले रहे कर्मचारियों में अधिकांश कंप्यूटर साइंस विभाग के व्याख्याता और विभागाध्यक्ष हैं। इनमें से कुछ ने अपनी पहली जॉइनिंग से लेकर आज तक अपनी मूल संस्था का मुंह तक नहीं देखा है। इस व्यवस्था का सबसे घातक पहलू यह है कि कागजों पर शिक्षक का पद भरा दिखाई देता है, जिससे वहां किसी अन्य स्थायी या वैकल्पिक शिक्षक की तैनाती नहीं हो पाती और पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है।

जनता के पैसों की बर्बादी: पॉलिटेक्निक संस्थानों में कंप्यूटर साइंस में सबसे ज्यादा छात्राएं प्रवेश लेती हैं। सरकार जिन्हें डेढ़ से ढाई लाख रुपये प्रतिमाह वेतन देती है, उनसे संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद, प्राविधिक शिक्षा परिषद, संयुक्त निदेशक कार्यालय, महानिदेशक कार्यालय या निदेशालय कानपुर में कंप्यूटरकरण के नाम पर क्लर्क स्तर की फाइलें बनवाई जा रही हैं।
नए महिला पॉलिटेक्निकों में व्यवस्थाएं शून्य और छात्राओं का संकट
कन्नौज और बाराबंकी जैसे नवीन महिला पॉलिटेक्निक संस्थानों में स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। दाखिला लेने वाली छात्राओं और उनके परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि उन्हें यह नहीं पता कि उनका पूरा कोर्स एक ही संस्थान में पूरा होगा या उन्हें बीच में किसी अन्य संस्थान में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

रहने का संकट और असुरक्षा: संस्थानों के मूल भवन में शिफ्ट न होने से छात्राओं को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिल रही है। परिजनों को कई गुना अधिक पैसे खर्च करके असुरक्षित माहौल में बाहर रहने का इंतजाम करना पड़ रहा है।

शिक्षक और भवन विहीन व्यवस्था: इन नए महिला पॉलिटेक्निकों में छात्राओं का प्रवेश तो कर लिया गया, लेकिन न तो किसी प्रधानाचार्य की स्थायी तैनाती हुई और न ही आवश्यक शिक्षकों या कर्मचारियों को पदस्थ किया गया। नवनिर्मित मूल भवनों में स्थानांतरित न किए जाने से छात्राएं केवल कागजी डिग्री के लिए अपने करियर की बलि चढ़ाने को मजबूर हैं।

अस्त व्यस्त छात्रावास: पुरानी महिला पॉलिटेक्निकों के स्टाफ को अटैचमेंट सिंडिकेट के तहत स्थानांतरित करने से छात्रावासों का संचालन पूरी तरह अस्त व्यस्त हो चुका है।
दो बार के निलंबित अधिकारी को लखनऊ जैसे प्रीमियम संस्थान की कमान
विभाग में रसूख और सांठगांठ का सबसे बड़ा उदाहरण राजकीय पॉलिटेक्निक लखनऊ के प्रधानाचार्य श्याम नारायण सिंह का मामला है।

छात्राओं की सुरक्षा में भारी चूक: पूर्व में महामाया महिला पॉलिटेक्निक बदलपुर, गौतम बुद्ध नगर में तैनाती के दौरान बेटियों की सुरक्षा के मामले में गंभीर लापरवाही और भारी चूक के कारण इन्हें निलंबित किया गया था।

भ्रष्टाचार और राजनीतिक रसूख: आरोप है कि मंत्री के सजातीय होने और विभाग में गहरी जड़ों के कारण इनका निलंबन समाप्त कर दिया गया। इसके बाद इन्हें लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण संस्था में प्रधानाचार्य बना दिया गया।

दो बार निलंबन का रिकॉर्ड: इससे पूर्व भी यह बोर्ड संबंधी गैरकानूनी और संदिग्ध क्रियाकलापों के चलते एक बार निलंबित हो चुके हैं। ऐसे अधिकारियों के हाथों में छात्राओं का भविष्य सौंपने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

शासनादेशों की अनदेखी, यूराइज धांधली और चर्चित चेहरे
पूर्व में तत्कालीन प्रमुख सचिव नरेंद्र भूषण ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी अवैध अटैचमेंट निरस्त करने के सख्त निर्देश दिए थे। परंतु उनके हटते ही सिंडिकेट ने मंत्री जी के तथाकथित कृपा पत्रों का सहारा लेकर एक-दो अटैचमेंट रद्द दिखाकर बाकी सभी को बहाल कर लिया और नए अटैचमेंट जारी कर दिए। महिला पॉलिटेक्निकों से हटाए गए कई शिक्षक एकल पद पर तैनात थे, जिससे संबंधित विषयों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई।

प्रकरण में शामिल प्रमुख नाम और भूमिकाएँ:

विकल्प कुमार सिंह (विभागाध्यक्ष कंप्यूटर, राजकीय महिला पॉलिटेक्निक प्रयागराज): इन्हें पहले ऐसी जगह भेजा गया जहां कंप्यूटर ब्रांच ही नहीं थी, फिर तुरंत बोर्ड में अटैच कर लिया गया। पिछले कई वर्षों से इन्होंने एक भी दिन क्लास नहीं ली है। पूर्व में परिषद के अवैध क्रियाकलापों के कारण हटाए गए संयुक्त सचिव से इनकी संलिप्तता सर्वविदित थी तथा तत्कालीन प्रमुख सचिव द्वारा भी इन्हें हटाने के निर्देश दिए गए थे।

मानेंद्र कनौजिया: गंभीर आरोपों के बाद बोर्ड से ट्रांसफर होने के बाद भी पढ़ाने के बजाय आज भी बोर्ड में डटे हुए हैं।

संजीव सिंह (प्रधानाचार्य, राजकीय महिला पॉलिटेक्निक लखनऊ): मूल जिम्मेदारियां छोड़ने और अटैचमेंट की सुविधाओं का लाभ उठाने के आरोपी।

विशेष तकनीकी सेल व अन्य सम्बद्ध कर्मी: अधिकतर महिला पॉलिटेक्निक के ही है
प्रवीन कुमार (कर्मशाला अधीक्षक), मुरलीधर पांडे (टेक्नीशियन), आलोक कुमार (बलिया), कुलदीप श्रीवास्तव (चरखारी महोबा), आकाश शर्मा (शाहजहांपुर), अतुल राज (कानपुर), सुमित कुमार, राहुल सिंह, विवेकानंद, पूजा सक्सेना, हेमदुर्ग पाल, विनीत वर्मा, सुनील कुमार, और विभागाध्यक्ष आत्म प्रकाश सिंह, अवधेश पटेल, कमल कुमार, हरि नाम ।

यूराइज यूराइज पोर्टल के नाम पर वित्तीय अनियमितता:
वर्ष 2021 में तत्कालीन निदेशक मनोज कुमार द्वारा यूराइज में अटैचमेंट हेतु 30 जुलाई 2021 को चार व्याख्याताओं (पूजा सक्सेना, विजय यादव, इशिता पाठक एवं राजेश राही – वेतन लगभग 1.5 लाख प्रतिमाह) की तैनाती का आदेश किया गया था। पिछले पांच वर्षों के कार्य का हिसाब दिए बिना, अब विकल्प सिंह के नेतृत्व में एक नई कमेटी बना दी गई जिसमें पूजा सक्सेना एवं अन्य लोग शामिल होकर मुफ्त का वेतन ले रहे हैं।

विभागीय सेवानिवृत्त अधिकारियों के अनुसार यूराइज वेबसाइट प्राविधिक शिक्षा, एकेटीयू और आईटीआई के लिए बनी थी, लेकिन एकेटीयू और आईटीआई ने इसे औचित्यहीन बताते हुए प्रयोग से इंकार कर दिया। इसके बावजूद प्राविधिक शिक्षा के डिप्लोमा सेक्टर ने अटैचमेंट उद्योग चलाने के लिए इसे लागू रखा, जो कि संगठित वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है।

अतः माननीय मुख्यमंत्री जी से गरीब छात्र छात्राओं के भविष्य की रक्षा हेतु इस हाई प्रोफाइल मामले की निष्पक्ष जांच की अपेक्षा है

विजिलेंस और एसआईटी जांच: विशेष तकनीकी सेल और इस सिंडिकेट के मुख्य किरदारों आत्म प्रकाश सिंह, अवधेश पटेल, विकल्प कुमार सिंह तथा दो बार निलंबित अधिकारियों की भूमिका और पिछले 5 वर्षों में वेतन व अटैचमेंट के नाम पर खर्च हुए करोड़ों के बजट की निष्पक्ष विजिलेंस जांच कराई जाए। इन पैसों का चौथाई हिस्सा भी यदि छात्राओं के छात्रावास, शौचालय, जर्जर भवन और प्रयोगशाला के लिए खर्च किया जाए तो लाखों छात्राओं का कल्याण होगा।

तत्काल निरस्तीकरण: पूर्व प्रमुख सचिव के आदेशों का अनुपालन कराते हुए सभी अवैध अटैचमेंट तत्काल निरस्त किए जाएं। सभी शिक्षकों व अधिकारियों को उनकी मूल संस्थाओं तथा कन्नौज और बाराबंकी जैसे नए महिला पॉलिटेक्निकों में भेजा जाए ताकि छात्राओं की सुरक्षा और पढ़ाई दोनों सुनिश्चित हो सके।

अनिल तिवारी, बेबाक लेखक

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